१) प्रत्येक जीवात्मा जो मनुष्य रूप में जन्मी है, जीवन में उत्थान व सफलता की सोच रखती है। अतः यह आवश्यक है कि विद्यार्थी जीवन में ही अपने सम्पूर्ण जीवन की दिशा धारा व लक्ष्य तय किये जाएं।
२) सर्वप्रथम अपने जीवन में लक्ष्य का निर्धारण करें। जीवन में क्या बनना है ,क्या करना है ? फिर इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए दृढ़ संकल्प के साथ जुट जाओ। अंतर्मन में यह पूर्ण विश्वास लेकर चलो कि सफलता मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है। निरंतर लक्ष्य प्राप्ति की धुन सवार रहे।
३) विद्यार्थी जीवन और युवावस्था जीवन के स्वर्णिम दौर हैँ , इसे व्यर्थ न जाने दें। अपने लक्ष्य को महान सामाजिक उद्देश्यों से जोड़ो। लक्ष्य सबके लिए कल्याणकारी हो। याद रखो युवावस्था का दौर निकल जाने पर सिवाय पश्चाताप के कुछ नहीं बचता है।
४) जब युवामन की सारी शक्तियाँ विचारों की , समय की , शरीर की , साधन की ; एक ही उच्च लक्ष्य की ओर लग जाती हैं तो फिर सफलता की प्राप्ति में कोई सन्देह नहीं रह जाता।
५) प्रत्येक व्यक्ति के भीतर एक ऐसा शक्ति केंद्र उपस्थित है , जो उसे इच्छानुसार उच्च स्थान पर पंहुचा सकता है। प्रत्येक व्यक्ति में आत्मा की अनंत और अपार शक्तियाँ विद्यमान है। अपनी शक्ति को पहचानें , अपने लक्ष्य को चुनौती के रूप में स्वीकार करें। दृढ़ संकल्प करें कि मै अपने लक्ष्य को अवश्य प्राप्त करूंगा।
६) स्मरण रखें कि आपका कोई भी उद्देश्य क्यों न हो, आपकी स्वयं की शक्ति के द्वारा ही पूर्ण हो सकता है।
दूसरों पर भरोसा किया तो निराशा ही हाथ लगेगी अतः अपने भीतर पुरुषार्थ की अग्नि को इतना प्रज्वल्लित करो कि लक्ष्य की प्राप्ति पर्यन्त वह हमें चैन न लेने दे।
७) युवामन जब लक्ष्य निर्धारित करता है तो बार बार अपने मार्ग से भटक जाता है। कुसंग और दुष्ट प्रवृत्तियां मार्ग में व्यवधान की तरह खड़ी हो जाती हैं। अपने उद्देश्य को प्राप्त करना चाहते हैं , तो अपनी आंतरिक शक्तियों को बढाईये , अपने अंदर लगन , कर्मण्यता और आत्मविश्वास उत्पन्न कीजिये।
८) जब आपका आत्मविश्वास चरम पर होगा एवं लक्ष्य प्राप्ति के लिए आप दृढ़ संकल्पित होंगें , पुरुषार्थ करने से पीछे नहीं हटेंगें तो आप पाएंगे कि सफलता कदम कदम पर परछाई की तरह आपके साथ है। हाँ एक बात और यदि आपका उद्देश्य या लक्ष्य महान है , सामाजिक कल्याण की भावना से जुड़ा है, तो ईश्वरीय पथ प्रदर्शन भी आपको मिल जायेगा, ऐसा विश्वास रखिये।
९) यह पथ हर व्यक्ति के लिए खुला हुआ है। आवश्यकता है अपने भीतर की शक्तियों को पहचानने की , अपना लक्ष्य निर्धारित करने की और दृढ संकल्प के साथ उसे पाने की भूख पैदा करने की। जो किसी की प्रतीक्षा न कर स्वयं पुरुषार्थ में संलग्न होते हैं , उनके लिए कोई लक्ष्य , कोई बाधा , कोई विघ्न बड़ा नहीं है।
२) सर्वप्रथम अपने जीवन में लक्ष्य का निर्धारण करें। जीवन में क्या बनना है ,क्या करना है ? फिर इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए दृढ़ संकल्प के साथ जुट जाओ। अंतर्मन में यह पूर्ण विश्वास लेकर चलो कि सफलता मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है। निरंतर लक्ष्य प्राप्ति की धुन सवार रहे।
३) विद्यार्थी जीवन और युवावस्था जीवन के स्वर्णिम दौर हैँ , इसे व्यर्थ न जाने दें। अपने लक्ष्य को महान सामाजिक उद्देश्यों से जोड़ो। लक्ष्य सबके लिए कल्याणकारी हो। याद रखो युवावस्था का दौर निकल जाने पर सिवाय पश्चाताप के कुछ नहीं बचता है।
४) जब युवामन की सारी शक्तियाँ विचारों की , समय की , शरीर की , साधन की ; एक ही उच्च लक्ष्य की ओर लग जाती हैं तो फिर सफलता की प्राप्ति में कोई सन्देह नहीं रह जाता।
५) प्रत्येक व्यक्ति के भीतर एक ऐसा शक्ति केंद्र उपस्थित है , जो उसे इच्छानुसार उच्च स्थान पर पंहुचा सकता है। प्रत्येक व्यक्ति में आत्मा की अनंत और अपार शक्तियाँ विद्यमान है। अपनी शक्ति को पहचानें , अपने लक्ष्य को चुनौती के रूप में स्वीकार करें। दृढ़ संकल्प करें कि मै अपने लक्ष्य को अवश्य प्राप्त करूंगा।
६) स्मरण रखें कि आपका कोई भी उद्देश्य क्यों न हो, आपकी स्वयं की शक्ति के द्वारा ही पूर्ण हो सकता है।
दूसरों पर भरोसा किया तो निराशा ही हाथ लगेगी अतः अपने भीतर पुरुषार्थ की अग्नि को इतना प्रज्वल्लित करो कि लक्ष्य की प्राप्ति पर्यन्त वह हमें चैन न लेने दे।
७) युवामन जब लक्ष्य निर्धारित करता है तो बार बार अपने मार्ग से भटक जाता है। कुसंग और दुष्ट प्रवृत्तियां मार्ग में व्यवधान की तरह खड़ी हो जाती हैं। अपने उद्देश्य को प्राप्त करना चाहते हैं , तो अपनी आंतरिक शक्तियों को बढाईये , अपने अंदर लगन , कर्मण्यता और आत्मविश्वास उत्पन्न कीजिये।
८) जब आपका आत्मविश्वास चरम पर होगा एवं लक्ष्य प्राप्ति के लिए आप दृढ़ संकल्पित होंगें , पुरुषार्थ करने से पीछे नहीं हटेंगें तो आप पाएंगे कि सफलता कदम कदम पर परछाई की तरह आपके साथ है। हाँ एक बात और यदि आपका उद्देश्य या लक्ष्य महान है , सामाजिक कल्याण की भावना से जुड़ा है, तो ईश्वरीय पथ प्रदर्शन भी आपको मिल जायेगा, ऐसा विश्वास रखिये।
९) यह पथ हर व्यक्ति के लिए खुला हुआ है। आवश्यकता है अपने भीतर की शक्तियों को पहचानने की , अपना लक्ष्य निर्धारित करने की और दृढ संकल्प के साथ उसे पाने की भूख पैदा करने की। जो किसी की प्रतीक्षा न कर स्वयं पुरुषार्थ में संलग्न होते हैं , उनके लिए कोई लक्ष्य , कोई बाधा , कोई विघ्न बड़ा नहीं है।
" मुश्किलों से भाग जाना आसान होता है
हर पहलू ज़िन्दगी का इम्तिहान होता है
डरने वाले को मिलता नहीं कुछ ज़िन्दगी में
लड़ने वालों के क़दमों में जहान होता है। "

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